प्रस्तुत लेख में कक्षा 10 हिंदी व्याकरण के महत्वपूर्ण विषय ‘समास’ को सरल भाषा में समझाया गया है। यदि आप Samas को विस्तार से सीखना चाहते हैं, तो यह पोस्ट आपके लिए बेहद उपयोगी है। CBSE कक्षा 10 के छात्र इस लेख की सहायता से समास के सभी भेद, उनके नियम और उदाहरण आसानी से समझ सकते हैं। साथ ही सामासिक शब्द, पूर्व पद और उत्तर पद की पूरी जानकारी भी दी गई है। इस लेख के माध्यम से आप कक्षा 10 हिंदी बोर्ड परीक्षा 2027 की बेहतर तैयारी कर सकते हैं।
समास का संक्षिप्त अवलोकन (Samas Quick Overview)
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पाठ शीर्षक | समास (Samas) |
| विधा | व्याकरण |
| कक्षा | सीबीएसई कक्षा 10 हिंदी |
| भेद | अव्ययीभाव समास, तत्पुरुष समास, कर्मधारय समास, द्विगु समास, द्वंद्व समास, बहुब्रीहि समास |
| उदाहरण | माता-पिता, राजपुत्र |
समास की परिभाषा क्या है?- Samas ki Paribhasha
समास का अर्थ होता है (Samas ki Paribhasha) — संक्षेप या छोटा रूप। जब दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर एक नया, छोटा और अर्थपूर्ण शब्द बनाया जाता है, तो उसे समास कहा जाता है।
सरल शब्दों में कहें तो, कई शब्दों को मिलाकर बने सार्थक और संक्षिप्त शब्द को समास कहते हैं। समास के प्रयोग से भाषा अधिक प्रभावशाली और संक्षिप्त बनती है।
जैसे –
‘रसोई के लिए घर’इसे हम ‘रसोईघर’भी कह सकते हैं।
संस्कृत, जर्मन तथा बहुत सी भारतीय भाषाओँ में समास का बहुत प्रयोग किया जाता है।

सामासिक शब्द क्या है ? (Compound Word)
समास (Samas) के नियमों से निर्मित शब्द सामासिक शब्द कहलाता है। इसे समस्तपद भी कहा जाता है। समास होने के बाद विभक्तियों के चिन्ह गायब हो जाते हैं।
जैसे –
1. रसोई के लिए घर = रसोईघर
2. हाथ के लिए कड़ी = हथकड़ी
3. नील और कमल = नीलकमल
4.राजा का पुत्र = राजपुत्र
पूर्वपद और उत्तरपद क्या है ? (Pre and Post Compound)
समास (Samas) रचना में दो पद होते हैं, पहले पद को ‘पूर्वपद’कहा जाता है और दूसरे पद को ‘उत्तरपद’कहा जाता है। इन दोनों से जो नया शब्द बनता है वो समस्त पद कहलाता है।
जैसे-
पूजाघर (समस्तपद) – पूजा (पूर्वपद) + घर (उत्तरपद) – पूजा के लिए घर (समास-विग्रह)
राजपुत्र (समस्तपद) – राजा (पूर्वपद) + पुत्र (उत्तरपद) – राजा का पुत्र (समास-विग्रह)
समास विग्रह कैसे होता है ? (Compound Words in Hindi)
सामासिक शब्दों के बीच के सम्बन्ध को स्पष्ट करने को समास-विग्रह कहते हैं। विग्रह के बाद सामासिक शब्द गायब हो जाते हैं अथार्त जब समस्त पद के सभी पद अलग-अलग किय जाते हैं, उसे समास-विग्रह कहते हैं।
जैसे –
माता-पिता = माता और पिता।
राजपुत्र = राजा का पुत्र।
समास और संधि में अंतर क्या है?
संधि का अर्थ होता है — मेल या जोड़। संधि में दो वर्णों के मिलन से ध्वनि और उच्चारण के अनुसार परिवर्तन होता है। इसमें कभी एक वर्ण बदलता है, कभी दोनों वर्णों में परिवर्तन होता है और कई बार नया वर्ण भी बन जाता है। संधि से बने शब्दों को अलग करने की प्रक्रिया को विच्छेद कहा जाता है। संधि में जुड़े शब्दों का मूल अर्थ सामान्यतः वही रहता है।
उदाहरण:
पुस्तक + आलय = पुस्तकालय
वहीं, समास का अर्थ होता है — संक्षेप। समास में वर्णों की बजाय शब्दों या पदों का महत्व होता है। इसमें दो या दो से अधिक पद मिलकर एक नया और संक्षिप्त समस्त पद बनाते हैं। समास में शब्दों के बीच की विभक्तियाँ हट जाती हैं। समस्त पद को अलग करने की प्रक्रिया को विग्रह कहा जाता है। समास में बने शब्द का अर्थ कभी मूल अर्थ के समान रहता है और कभी बदल भी जाता है।
उदाहरण:
विषधर = विष को धारण करने वाला, अर्थात शिव।
समास के भेद क्या है ?- Samas ke Bhed
समास के मुख्यतः छः भेद माने जाते हैं –
- अव्ययीभाव समास
- बहुब्रीहि समास
- तत्पुरुष समास
- कर्मधारय समास
- द्विगु समास
- द्वंद्व समास
1). अव्ययीभाव समास क्या है?- Avyayibhav Samas
जिस समास (Samas) में पहला पद प्रधान होता है और वह अव्यय के रूप में प्रयुक्त होता है, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। इस समास में अव्यय शब्द का रूप लिंग, वचन और कारक के अनुसार नहीं बदलता, बल्कि हमेशा समान रहता है।
सरल शब्दों में, जहाँ किसी शब्द की पुनरावृत्ति हो या दोनों शब्द मिलकर अव्यय की तरह कार्य करें, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है। संस्कृत में उपसर्ग युक्त शब्दों को भी अव्ययीभाव समास के अंतर्गत माना जाता है।
इस समास में प्रायः पहला पद उपसर्ग होता है, जैसे – अ, आ, अनु, प्रति, हर, भर, नि, निर, यथा, यावत आदि। ये उपसर्ग विशेष अर्थ का बोध कराते हैं।
Avyayibhav Samas ke Udaharan
- यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार
- प्रतिदिन = प्रत्येक दिन
- आजन्म = जन्म से लेकर
- घर-घर = प्रत्येक घर
- रातों रात = रात ही रात में
- आमरण = मृत्यु तक
- अभूतपूर्व = जो पहले नहीं हुआ
- निर्भय = बिना भय के
- अनुकूल = मन के अनुसार
- भरपेट = पेट भरकर
- बेशक = शक के बिना
- खुबसूरत = अच्छी सूरत वाली
2) तत्पुरुष समास क्या है?- Tatpurush Samas
जिस समास (Samas) में उत्तरपद अर्थात दूसरा पद प्रधान होता है और पूर्वपद गौण रहता है, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। यह समास कारक संबंध पर आधारित होता है। तत्पुरुष समास में दो पदों के बीच आने वाले कारक चिन्हों का लोप हो जाता है।
दूसरे शब्दों में, जब दो शब्द मिलकर ऐसा समस्त पद बनाते हैं जिसमें कारक का संबंध छिपा रहता है, वहाँ तत्पुरुष समास होता है। विग्रह करने पर जो कारक प्रकट होता है, उसी के आधार पर उसके भेद निर्धारित किए जाते हैं।
इस समास में सामान्यतः पहला पद विशेषण और दूसरा पद विशेष्य होता है। चूँकि दूसरा पद मुख्य अर्थ प्रदान करता है, इसलिए तत्पुरुष समास में उत्तरपद की प्रधानता मानी जाती है।
Tatpurush Samas ke Udaharan
जैसे –
धर्म का ग्रन्थ = धर्मग्रन्थ
राजा का कुमार = राजकुमार
तुलसीदासकृत = तुलसीदास द्वारा कृत
इसमें कर्ता और संबोधन कारक को छोड़कर शेष छ: कारक चिन्हों का प्रयोग होता है। जैसे – कर्म कारक, करण कारक, सम्प्रदान कारक, अपादान कारक, सम्बन्ध कारक, अधिकरण कारक इस समास में दूसरा पद प्रधान होता है।
कर्म तत्पुरुष – इसमें दो पदों के बीच में कर्मकारक छिपा हुआ होता है। कर्मकारक का चिन्ह ‘को’ होता है। ‘को’को कर्मकारक की विभक्ति भी कहा जाता है। उसे कर्म तत्पुरुष समास कहते हैं। ‘को’के लोप से यह समास बनता है।
जैसे – ग्रंथकार = ग्रन्थ को लिखने वाला
करण तत्पुरुष – जहाँ पर पहले पद में करण कारक का बोध होता है। इसमें दो पदों के बीच करण कारक छिपा होता है। करण कारक का चिन्ह या विभक्ति ‘के द्वारा’और ‘से’होता है। उसे करण तत्पुरुष कहते हैं। ‘से’और ‘के द्वारा’के लोप से यह समास बनता है। जैसे – वाल्मिकिरचित = वाल्मीकि के द्वारा रचित
सम्प्रदान तत्पुरुष – इसमें दो पदों के बीच सम्प्रदान कारक छिपा होता है। सम्प्रदान कारक का चिन्ह या विभक्ति ‘के लिए’होती है। उसे सम्प्रदान तत्पुरुष समास कहते हैं। ‘के लिए’ का लोप होने से यह समास बनता है।
जैसे – सत्याग्रह = सत्य के लिए आग्रह
अपादान तत्पुरुष – इसमें दो पदों के बीच में अपादान कारक छिपा होता है। अपादान कारक का चिन्ह या विभक्ति ‘से अलग’ होता है। उसे अपादान तत्पुरुष समास कहते हैं। ‘से’का लोप होने से यह समास बनता है।
जैसे – पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट
सम्बन्ध तत्पुरुष – इसमें दो पदों के बीच में सम्बन्ध कारक छिपा होता है। सम्बन्ध कारक के चिन्ह या विभक्ति ‘का, ‘के, ‘की’होती हैं। उसे सम्बन्ध तत्पुरुष समास कहते हैं। ‘का, ‘के, ‘की’आदि का लोप होने से यह समास बनता है।
जैसे – राजसभा = राजा की सभा
अधिकरण तत्पुरुष – इसमें दो पदों के बीच अधिकरण कारक छिपा होता है। अधिकरण कारक का चिन्ह या विभक्ति ‘में, ‘पर’होता है। उसे अधिकरण तत्पुरुष समास कहते हैं। ‘में’और ‘पर’का लोप होने से यह समास बनता है।
जैसे – जलसमाधि = जल में समाधि
तत्पुरुष समास के प्रकार के बारे में बताओ
नञ तत्पुरुष समास
इसमें पहला पद निषेधात्मक होता है उसे नञ तत्पुरुष समास कहते हैं।
जैसे –
असभ्य = न सभ्य
अनादि = न आदि
असंभव = न संभव
अनंत = न अंत
3) कर्मधारय समास क्या है ?- Karmadharaya Samas
जिस समास (Samas) का उत्तरपद प्रधान होता है, जिसके लिंग, वचन भी सामान होते हैं। जो समास में विशेषण-विशेष्य और उपमेय-उपमान से मिलकर बनते हैं, उसे कर्मधारय समास कहते हैं। कर्मधारय समास में व्यक्ति, वस्तु आदि की विशेषता का बोध होता है। कर्मधारय समास के विग्रह में ‘है जो, ‘के समान है जो’ तथा ‘रूपी’शब्दों का प्रयोग होता है।
जैसे –
चन्द्रमुख – चन्द्रमा के सामान मुख वाला – (विशेषता)
दहीवड़ा – दही में डूबा बड़ा – (विशेषता)
गुरुदेव – गुरु रूपी देव – (विशेषता)
चरण कमल – कमल के समान चरण – (विशेषता)
नील गगन – नीला है जो असमान – (विशेषता)
4) द्विगु समास क्या है ?- Dvigu Samas
द्विगु समास वह समास है, जिसमें पूर्वपद संख्यावाचक होता है। कभी-कभी उत्तरपद भी संख्यावाचक हो सकता है। इस समास में संख्या किसी समूह या समाहार का बोध कराती है, न कि किसी विशेष अर्थ का। ऐसे समास को द्विगु समास कहते हैं।
जैसे –
नवग्रह = नौ ग्रहों का समूह
दोपहर = दो पहरों का समाहार
त्रिवेणी = तीन वेणियों का समूह
पंचतन्त्र = पांच तंत्रों का समूह
त्रिलोक = तीन लोकों का समाहार
शताब्दी = सौ अब्दों का समूह
सप्तऋषि = सात ऋषियों का समूह
त्रिकोण = तीन कोणों का समाहार
सप्ताह = सात दिनों का समूह
तिरंगा = तीन रंगों का समूह
चतुर्वेद = चार वेदों का समाहार
द्विगु समास के भेद क्या है ?- Dvigu Samas ke Bhed
1. समाहारद्विगु समास
समाहार का मतलब होता है समुदाय, इकट्ठा होना, समेटना उसे समाहारद्विगु समास कहते हैं।
जैसे –
तीन लोकों का समाहार = त्रिलोक
पाँचों वटों का समाहार = पंचवटी
तीन भुवनों का समाहार = त्रिभुवन
2. उत्तरपदप्रधानद्विगु समास
इसका दूसरा पद प्रधान रहता है और पहला पद संख्यावाची। इसमें समाहार नहीं जोड़ा जाता।
उत्तरपदप्रधानद्विगु समास दो प्रकार के होते हैं।
(1) बेटा या फिर उत्पन्न के अर्थ में।
जैसे –
दो माँ का =दुमाता
दो सूतों के मेल का = दुसूती।
(2) जहाँ पर सच में उत्तरपद पर जोर दिया जाता है।
जैसे –
पांच प्रमाण = पंचप्रमाण
पांच हत्थड = पंचहत्थड
5) द्वंद्व समास क्या है ?- Dvand Samas
इस समास में दोनों पद ही प्रधान होते हैं इसमें किसी भी पद का गौण नहीं होता है। ये दोनों पद एक-दूसरे पद के विलोम होते हैं लेकिन ये हमेशा नहीं होता है। इसका विग्रह करने पर और, अथवा, या, एवं का प्रयोग होता है उसे द्वंद्व समास कहते हैं। द्वंद्व समास में योजक चिन्ह (-) और ‘या’ का बोध होता है।
जैसे –
जलवायु = जल और वायु
अपना-पराया = अपना या पराया
पाप-पुण्य = पाप और पुण्य
राधा-कृष्ण = राधा और कृष्ण
अन्न-जल = अन्न और जल
नर-नारी = नर और नारी
गुण-दोष = गुण और दोष
देश-विदेश = देश और विदेश
द्वंद्व समास के भेद- Dvand Samas Ke Bhed
1. इतरेतरद्वंद्व समास
वो द्वंद्व जिसमें और शब्द से भी पद जुड़े होते हैं और अलग अस्तित्व रखते हों उसे इतरेतर द्वंद्व समास कहते हैं। इस समास से जो पद बनते हैं वो हमेशा बहुवचन में प्रयोग होते हैं क्योंकि वे दो या दो से अधिक पदों से मिलकर बने होते हैं।
जैसे –
राम और कृष्ण = राम-कृष्ण
माँ और बाप = माँ-बाप
अमीर और गरीब = अमीर-गरीब
गाय और बैल = गाय-बैल
ऋषि और मुनि = ऋषि-मुनि
यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि इतरेतर द्वन्द्व में दोनों पद न केवल प्रधान होते है, बल्कि अपना अलग-अलग अस्तित्व भी रखते है।
2. समाहारद्वंद्व समास
समाहार का अर्थ होता है – समूह। जब द्वंद्व समास के दोनों पद और समुच्चयबोधक से जुड़ा होने पर भी अलग-अलग अस्तिव नहीं रखकर समूह का बोध कराते हैं, तब वह समाहारद्वंद्व समास कहलाता है। इस समास में दो पदों के अलावा तीसरा पद भी छुपा होता है और अपने अर्थ का बोध अप्रत्यक्ष रूप से कराते हैं।
जैसे –
दालरोटी = दाल और रोटी
हाथपाँव = हाथ और पाँव
आहारनिंद्रा = आहार और निंद्रा
3. वैकल्पिक द्वंद्व समास
इस द्वंद्व समास में दो पदों के बीच में या, अथवा आदि विकल्पसूचक अव्यय छिपे होते हैं उसे वैकल्पिक द्वंद्व समास कहते हैं। इस समास में ज्यादा से ज्यादा दो विपरीतार्थक शब्दों का योग होता है।
इस समास में विकल्प सूचक समुच्चयबोधक अव्यय ‘वा’, ‘या’, ‘अथवा’ का प्रयोग होता है, जिसका समास करने पर लोप हो जाता है।
जैसे –
पाप-पुण्य = पाप या पुण्य
भला-बुरा = भला या बुरा
थोडा-बहुत = थोडा या बहुत
6) बहुब्रीहि समास- Bahuvrihi Samas
इस समास (Samas) में कोई भी पद प्रधान नहीं होता। जब दो पद मिलकर तीसरा पद बनाते हैं तब वह तीसरा पद प्रधान होता है। इसका विग्रह करने पर “वाला, है, जो, जिसका, जिसकी, जिसके, वह”आदि आते हैं, वह बहुब्रीहि समास कहलाता है।
दूसरे शब्दों में– जिस समास में पूर्वपद तथा उत्तरपद- दोनों में से कोई भी पद प्रधान न होकर कोई अन्य पद ही प्रधान हो, वह बहुव्रीहि समास कहलाता है।
जिस समस्त-पद में कोई पद प्रधान नहीं होता, दोनों पद मिल कर किसी तीसरे पद की ओर संकेत करते है, उसमें बहुव्रीहि समास होता है। ‘नीलकंठ’, नीला है कंठ जिसका अर्थात शिव। यहाँ पर दोनों पदों ने मिल कर एक तीसरे पद ‘शिव’ का संकेत किया, इसलिए यह बहुव्रीहि समास है।
इस समास के समासगत पदों में कोई भी प्रधान नहीं होता, बल्कि पूरा समस्तपद ही किसी अन्य पद का विशेषण होता है।
जैसे –
गजानन = गज का आनन है जिसका (गणेश)
त्रिनेत्र = तीन नेत्र हैं जिसके (शिव)
नीलकंठ = नीला है कंठ जिसका (शिव)
लम्बोदर = लम्बा है उदर जिसका (गणेश)
दशानन = दश हैं आनन जिसके (रावण)
चतुर्भुज = चार भुजाओं वाला (विष्णु)
पीताम्बर = पीले हैं वस्त्र जिसके (कृष्ण)
चक्रधर= चक्र को धारण करने वाला (विष्णु)
बहुब्रीहि समास के भेद- Bahuvrihi Samas Ke Bhed
1. समानाधिकरण बहुब्रीहि समास
इसमें सभी पद कर्ता कारक की विभक्ति के होते हैं लेकिन समस्त पद के द्वारा जो अन्य उक्त होता है, वो कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध, अधिकरण आदि विभक्तियों में भी उक्त हो जाता है उसे समानाधिकरण बहुब्रीहि समास कहते हैं।
जैसे –
प्राप्त है उदक जिसको = प्रप्तोद्क
जीती गई इन्द्रियां हैं जिसके द्वारा = जितेंद्रियाँ
दत्त है भोजन जिसके लिए = दत्तभोजन
निर्गत है धन जिससे = निर्धन
नेक है नाम जिसका = नेकनाम
सात है खण्ड जिसमें = सतखंडा
2. व्यधिकरण बहुब्रीहि समास
समानाधिकरण बहुब्रीहि समास में दोनों पद कर्ता कारक की विभक्ति के होते हैं लेकिन यहाँ पहला पद तो कर्ता कारक की विभक्ति का होता है लेकिन बाद वाला पद सम्बन्ध या फिर अधिकरण कारक का होता है, उसे व्यधिकरण बहुब्रीहि समास कहते हैं।
जैसे –
शूल है पाणी में जिसके = शूलपाणी
वीणा है पाणी में जिसके = वीणापाणी
3. तुल्ययोग बहुब्रीहि समास
जिसमें पहला पद ‘सह’ होता है वह तुल्ययोग बहुब्रीहि समास कहलाता है। इसे सहबहुब्रीहि समास भी कहती हैं। सह का अर्थ होता है साथ और समास होने की वजह से सह के स्थान पर केवल स रह जाता है।
इस समास में इस बात पर ध्यान दिया जाता है की विग्रह करते समय जो सह दूसरा वाला शब्द प्रतीत हो वो समास में पहला हो जाता है।
जैसे –
जो बल के साथ है = सबल
जो देह के साथ है = सदेह
जो परिवार के साथ है = सपरिवार
4. व्यतिहार बहुब्रीहि समास
जिससे घात या प्रतिघात की सुचना मिले उसे व्यतिहार बहुब्रीहि समास कहते हैं। इस समास में यह प्रतीत होता है की ‘इस चीज से और उस चीज से लड़ाई हुई।
जैसे –
मुक्के-मुक्के से जो लड़ाई हुई = मुक्का-मुक्की
बातों-बातों से जो लड़ाई हुई = बाताबाती
5. प्रादी बहुब्रीहि समास
जिस बहुब्रीहि समास पूर्वपद उपसर्ग हो वह प्रादी बहुब्रीहि समास कहलाता है।
जैसे –
नहीं है रहम जिसमें = बेरहम
नहीं है जन जहाँ = निर्जन
द्विगु और बहुव्रीहि समास में क्या अंतर है ?
Compound words in hindi – द्विगु समास का पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है और दूसरा पद विशेष्य होता है जबकि बहुव्रीहि समास में समस्त पद ही विशेषण का कार्य करता है।
जैसे-
चतुर्भुज – चार भुजाओं का समूह – द्विगु समास।
चतुर्भुज – चार है भुजाएँ जिसकी अर्थात विष्णु – बहुव्रीहि समास।
पंचवटी – पाँच वटों का समाहार – द्विगु समास।
पंचवटी – पाँच वटों से घिरा एक निश्चित स्थल अर्थात दंडकारण्य में स्थित वह स्थान जहाँ वनवासी राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ निवास किया – बहुव्रीहि समास।
त्रिलोचन – तीन लोचनों का समूह – द्विगु समास।
त्रिलोचन – तीन लोचन हैं जिसके अर्थात शिव – बहुव्रीहि समास।
दशानन – दस आननों का समूह – द्विगु समास।
दशानन – दस आनन हैं जिसके अर्थात रावण – बहुव्रीहि समास।
द्विगु और कर्मधारय में क्या अंतर है ?
(i) द्विगु का पहला पद हमेशा संख्यावाचक विशेषण होता है जो दूसरे पद की गिनती बताता है जबकि कर्मधारय का एक पद विशेषण होने पर भी संख्यावाचक कभी नहीं होता है।
(ii) द्विगु का पहला पद ही विशेषण बन कर प्रयोग में आता है जबकि कर्मधारय में कोई भी पद दूसरे पद का विशेषण हो सकता है।
जैसे-
नवरत्न – नौ रत्नों का समूह – द्विगु समास
चतुर्वर्ण – चार वर्णो का समूह – द्विगु समास
पुरुषोत्तम – पुरुषों में जो है उत्तम – कर्मधारय समास
रक्तोत्पल – रक्त है जो उत्पल – कर्मधारय समास
समास से जुड़े महत्वपूर्ण FAQs
समास (Samas) क्या होता है?
दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से बने संक्षिप्त शब्द को समास कहते हैं। इसमें शब्दों के बीच के विभक्ति चिन्ह हट जाते हैं।
समास (Samas) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
समास का उद्देश्य भाषा को संक्षिप्त, प्रभावशाली और सुंदर बनाना होता है।
समास (Samas) के कितने भेद होते हैं?
समास के मुख्यतः छह भेद होते हैं—
अव्ययीभाव समास
तत्पुरुष समास
कर्मधारय समास
द्वंद्व समास
द्विगु समास
बहुव्रीहि समास
समास और संधि में क्या अंतर है?
समास में दो शब्द मिलकर नया शब्द बनाते हैं, जबकि संधि में दो वर्णों के मेल से ध्वनि परिवर्तन होता है।
समास (Samas) का विग्रह क्या होता है?
समस्त पद को अलग-अलग शब्दों में विभाजित करना समास-विग्रह कहलाता है।
तत्पुरुष समास किसे कहते हैं?
जिस समास (Samas) में उत्तरपद प्रधान होता है और दोनों पदों के बीच कारक संबंध होता है, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं।
कर्मधारय समास की पहचान कैसे करें?
जिस समास में उपमान और उपमेय या विशेषण-विशेष्य का संबंध हो, उसे कर्मधारय समास कहते हैं।
द्वंद्व समास क्या होता है?
जिस समास (Samas) में दोनों पद प्रधान हों और “और” का भाव आए, उसे द्वंद्व समास कहते हैं।
द्विगु समास किसे कहते हैं?
जिस समास में पूर्वपद संख्यावाचक हो और समूह का बोध कराए, उसे द्विगु समास कहते हैं।
बहुव्रीहि समास की विशेषता क्या है?
जिस समास में कोई भी पद प्रधान न होकर तीसरे अर्थ का बोध हो, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं।
अव्ययीभाव समास क्या है?
जिस समास का पहला पद अव्यय हो और पूरा समस्त पद अव्यय की तरह कार्य करे, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं।